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Tagged With: poem

स्वरनाद ..

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वाट…

देवाच्या दरबारात मांडला लग्नाचा थाट ‘वरुण’ राजाची पडणार होती साता जन्माची गाठ घरचं लग्न समजून त्यांनी खूप पाहिली वाट पण रिक्तचं राहिलं शेवटी “सोनियाचं” ताट

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एक उंबरठा….

दर वर्षी सर्वच  बोलतात स्त्रीला ही जगण्याचा हक्क आहे माणूस म्हणून जगतांना तिचे पण काही स्वप्नं आहेत,

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यादें

वो बचपन के सुहाने दिन आज भी याद आते है, मन के पटल पर वो फिर से ताजा हो जाते है ।

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आशा

आशा रोज एक नई सुबह दिल पर दस्तक देती है अंधेरे को चिरते हुए एक आशा की किरण लाती है . सुने पडे आंगन में उम्मीदे बरसाती है तुफानों से लड़ने मेरे मन का दिया जलाती हैं. जग चाहे चिल्लाए – “अब कोई राह नहीं” फिर भी वह मेरे दिल में चलने का साहस बढ़ाती … Continue reading »

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