browser icon
You are using an insecure version of your web browser. Please update your browser!
Using an outdated browser makes your computer unsafe. For a safer, faster, more enjoyable user experience, please update your browser today or try a newer browser.

Tagged With: hindi poem

चुनाओं का दौर

                        हो गया ऐलान आ गए है चुनाव हर कोई खेलेगा अपना अपना दाँव। हमे बनायेंगे वो भगवान मीठी हो जायेंगी उनकी जुबाँ झूठे मुठे वादोंसे चलाएंगे अपनी दुकान। कोई चलेगा “विकास” का दाँव कोई खेलेगा “जाती” का कार्ड सपनों का दौर चलेगा वैसे … Continue reading »

Categories: Hindi, Hindi Poems | Tags: , | 3 Comments

मैं तिरंगा बोल रहा हूँ …..

                          आझादी के ७० साल बीत गए पर फिर भी मै असमंजस में हूँ … इस स्वतंत्र खुले आकाश मे जब मै लहराता हूँ …. तो मेरे मन में यह ख़याल आता है क्या सच में, मै खुली साँस ले रहे हूँ ? या … Continue reading »

Categories: Hindi, Hindi Poems | Tags: , , | 2 Comments

राजनीती

राजनीती के मायने इतने बदल गए है नेताओं की टिका टिपणी चढ़ी बनियान तक पहुंच गए है। क्या मर्यादा,क्या विचार? दिखता है बस व्यभिचार खस्ता हो गया है लोकतंत्र “सत्ता” केवल व्यापार। सबका अपना मतलब सबका अपना रंग सबकुछ जायज है रोज की नेताओं की जुबानी जंग। “आय. सी. यु. ” में है व्यवस्था लोकतंत्र … Continue reading »

Categories: English | Tags: , , | Leave a comment

देश का “लाल”

दिया था आपने नारा  “जय जवान, जय किसान” जीवित हो उठा था फिरसे मुरझाया हिन्दुस्थान। दुनियाँ ये मानती थी हम तो हो गए दुर्बल पर आपने अपने निश्चयसे हिन्दुस्थान को कर दिया सबल। एक तरफ था युद्ध दूसरी तरफ थी भूख मरी लेकिन आपका अटूट विश्वास पड़ा था दोनों पर भारी। दुनियाँ मान चुकी थी लोहा … Continue reading »

Categories: Hindi, Hindi Poems | Tags: , , | 1 Comment

रावण

बड़े ही उल्हास से करेंगे हम रावण दहन पर सोच कभी रावण जैसा ही है अपना मन , भले ही समा बैठे है हम ज्ञान का भंडार पर छूटा नहीं हमसे भीतर बैठा अहंकार , राह चलते कोई भी रोज ‘सीता ‘ हरण कर जाता है देखकर “निर्भया” से बर्बरता रावण का भी सिर झुक … Continue reading »

Categories: Hindi, Hindi Poems | Tags: , | Leave a comment

रावन राज…

जिधर देखो उधर मची है कैसी लुट ? जात, धर्म के नाम पर लोगो में डाल रहे फुट ।

Categories: Hindi, Hindi Poems | Tags: , , | Leave a comment

अर्थ-हिन व्यवस्था…

क्या हो रहा है यहाँ पर क्यों सबके मन में है खोट? गरिब बेचारा मर रहा है और नेता खा रहे है नोट ।

Categories: Hindi, Hindi Poems | Tags: , , , , | Leave a comment

एक और घोटाला…

फिर से एक बार खुल गई है पोल देश के गद्दारोंने बनाया कितना बडा ‘होल’ ।

Categories: Hindi, Hindi Poems | Tags: , , , , | Leave a comment

दस्तक..

एक नन्हीं सी परी आशा बनकर आई तो मानो ऐसा लगा कि उजडे चमन में खिलखिलाती धूप छाई । उस कलिने धिरे धिरे अपनी पंखुडियाँ खोली

Categories: Hindi, Hindi Poems | Tags: , , , , | Leave a comment

आतंक पर चढी सियासत..

नफरत कि आँधी ने बाटाँ था एक माँ को मंदिर, मश्दि के नाम पर हमने बाँटा यहा प्यार को । खडी हुई दिवारें बही खुन कि नदियाँ

Categories: Hindi, Hindi Poems | Tags: , , , | 1 Comment
Powered by Kapil