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मैं तिरंगा बोल रहा हूँ …..

Posted by on October 25, 2017

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आझादी के ७० साल बीत गए
पर फिर भी मै असमंजस में हूँ …
इस स्वतंत्र खुले आकाश मे
जब मै लहराता हूँ ….
तो मेरे मन में यह ख़याल आता है
क्या सच में, मै खुली साँस ले रहे हूँ ?
या फिर सिर्फ आझाद होने का झुठा
दिलासा अपने आप को दे रहा हूँ ?
क्यों कि यहाँ हर बात पर
बहस हो जाती है
राष्ट्रगीत गाए या न गाए
इस पर भी जंग छिड़ है।
“बुद्धिजीवी “का मतलब
क्या ऐ निकलता है ?
“राष्ट्रगीत ” को गाना
कोर्ट का मसला बन जाता है ?
मै पूछना चाहता हूँ
क्या साबित करना चाहते हो आप?
लगता है की
आझादी का दूध पीकर पल रहे है साँप।
भूल गए आप
पुरखो का बलिदान और असीम त्याग
“देशप्रेम”के आड़ में
क्यों भड़का रहे हो नफरत की आग ?
याद करो ,
हजारों वीरोने ‘तिरंगा ” लिए
अपनी कुर्बानी दी थी
‘वंदे मातरम” कहते कहते
आझादी की  राह में जान दी थी।
क्यों ए खटास ?
क्यों मन में हिचकिचाट होती है ?
मेरे स्वतंत्रता के योद्धा का
खून का कतरा कतरा शर्मिंदा है।
मुझे लगता है की
हर वीर चीख चीख कर बोल रहा है
जाग जाओ , देखो
दुश्मन तैयार ही बैठा है।
चढ़ाओ सिर्फ देशभक्ती का रंग
एक रहो , आगे बढ़ो संग संग।
संभल जाओ , वरना
ऐ धरती फिरसे लहू लुहान हो जाऐगी
आनेवाली पीढ़ियाँ मुझसें ही
प्रश्न पुछेंगी।
बोलेगी ,
“विरासत मे हमे क्या दिया है ?
हर घड़ी हमें होता है धोखा
इससे अच्छा हमे पैदा ही नहीं किया होता “.

2 Responses to मैं तिरंगा बोल रहा हूँ …..

  1. Manju Ruj

    Like it after reading this poem.. keeping on writing..

  2. Rajeshwari.

    Well presented the feelings of patriotism and national anthem through your mighty word power Varsha. The practice would instill a feeling within one a sense of committed patriotism and nationalism especially in the generation next.People must feel this is my country. In other countries, we respect their restrictions.

    Rajeshwari.

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