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रावण

Posted by on September 30, 2017

बड़े ही उल्हास से

करेंगे हम रावण दहन
पर सोच कभी
रावण जैसा ही है अपना मन ,

भले ही समा बैठे है
हम ज्ञान का भंडार
पर छूटा नहीं
हमसे भीतर बैठा अहंकार ,

राह चलते कोई भी
रोज ‘सीता ‘ हरण कर जाता है
देखकर “निर्भया” से बर्बरता
रावण का भी सिर झुक जाता है ,

सबके मन में छिपा बैठा है
एक रावण आज भी
पर अपने मन को
‘राम’ नहीं बना पाए हम आज भी।

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