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यादें

Posted by on March 3, 2011

वो बचपन के

सुहाने दिन आज भी

याद आते है,

मन के पटल पर

वो फिर से ताजा

हो जाते है ।

वो अपने ही धुन में

चलना और मचलना

बेखौफ होकर उछलना

और कुदना ।

ना जीतने की ख्वाईश़

ना हारने का गम

अपनी ही दुनियाँ थी

और अपने ही थे रंग ।

किसी की फटकार पर

वो आँखे झुकाना

मन ही मन धीरें से

मंद मंद मुस्कराना ।

कभी कभी यूहीं

झुठ मूठ रोना

अपनी गल्तियों को

कभी कभी छुपाना ।

मासुम होकर कभी

आसूंओं का निकलना

रुठने पर माँ का

वो हमको मनाना ।

कभी मोरनी बनकर

मटकना और नाचना

जिद  कर करके

किसी को सताना ।

बचपन मे ही यारों

लगता है हम जी रहे थे

उम्र बढती गई

और हम जीना भूल रहे थे ।

One Response to यादें

  1. HIMANSHU RAJ

    सच में, चुकि उस वक़्त हमारा मन किसी भी जिम्मेदारियों में बंधा नहीं होता है ,ना।

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